'' दिया '' स्वयं जलता है लेकिन रोशनी दूसरों को देता है....
'' दिया '' स्वयं जलता है लेकिन रोशनी दूसरों को देता है....
आलेख : मधुप्रकाश लड्ढा, राजसमंद
राजसमंद। अपने नाम शब्द को चरितार्थ करना हर किसी के बुते की बात नहीं होती और जो यह कर लेता है वो ''कंकर से शंकर'' बन जाता है।
कोई भी मनुष्य, जन्म से देव नहीं होता उसके लिए उसे त्याग , तपस्या और समर्पण करना होता है तभी वह देवत्व को प्राप्त होता है।
अच्छाई और बुराई, दोनो मानव शरीर के अभिन्न अंग होते है। यह स्वयं पर निर्भर करता है कि आप अपने व्यक्तित्व में किसे आश्रय देते है और यही आश्रय आपके संपूर्ण जीवन का तानाबाना बुनता है।
'' दिया '' स्वयं जलता है लेकिन रोशनी दूसरों को देता है। कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जिनको राजनीतिक और सामाजिक दायरे में नहीं बांधा जा सकता। वो जहां भी रहेंगे इस श्रृष्टि के लिए श्रेष्ठ कार्य ही करेंगे। पद और शोहरत से व्यक्ति बदल सकता है लेकिन जिनका व्यक्तित्व ही महान होता है उनके लिए पद, पैसा और शोहरत कोई मायने नहीं रखता क्योंकि उनका आगमन ही स्वयं को जलाकर इस जगत को प्रकाशित करने के लिए हुआ है। कमल, कीचड़ में ही खिलता है लेकिन रहता बेदाग ही है, कीचड़ की क्या मज़ाल जो कमल पर कोई निशान छोड़ दे।
हम यहां बात कर रहे हैं राजस्थान की यशस्वी उप मुख्यमंत्री दिया कुमारी की... जिन्होंने अपने नाम को चरितार्थ करते हुए हर किसी के जीवन को रोशन किया है। जिस क्षेत्र और स्थान का नेतृत्व किया, उस की आबो हवा में सुगंध और खुशहाली के बीज बो दिए। सत्य को किसी प्रमाण और आईने की जरूरत नहीं होती क्योंकि उस पर झूठ और निंदा का लबादा कभी चढ़ ही नहीं सकता। मुखौटे वो लोग बदलते है जिनके चरित्र दोहरे होते है। रोशनी पर अंधेरे की चादर कभी चढ़ ही नहीं सकती। जब - जब सूर्यवंशियों ने हुंकार भरी है, तब - तब राक्षसी प्रवृतियों का विघटन ही हुआ है।
रोशनी देने के लिए स्वयं जलना होता है। जिसका नाम ही ''दिया'' हो उन पर आप चाहे जितने शब्द बाणों के अस्त्र चलाओ आंधी और तूफान प्रस्तुत कर दो लेकिन जिसकी नियति ही जग को रोशन करना है वो तो रोशनी ही फैलाएगा। शब्द बाणों के घाव सहना '' श्रीराम '' के वंशजों को विरासत में मिला है। ये शब्द बाण भी विराट व्यक्तित्व से टकराकर धूल धूसरित हो जाएंगे। फिर सुबह होगी और फिर सूरज चमकेगा।
आलेख : मधुप्रकाश लड्ढा, राजसमंद

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