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अन्नू राठौड़ (रुद्रांजली) की कलम से ''अंतर्मन का दीप''

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अन्नू राठौड़ (रुद्रांजली) की कलम से '' अंतर्मन का दीप'' दीपावली आती है तो घर जगमगा उठते हैं। द्वार पर बंदनवार, आँगन में रंगोली, छत पर लड़ियों की ज्योति और भीतर लक्ष्मी पूजन की तैयारी। हम इस बाह्य प्रकाश-पर्व में इतनी लीन हो जाते हैं कि विस्मृत कर बैठते हैं कि एक और घर भी है, जिसे वर्ष भर से प्रकाश की प्रतीक्षा है — वह है हमारा अंतर्मन। बाहर का तम तो एक दीप से छिन्न-भिन्न हो जाता है, पर भीतर का तम? भीतर जो ईर्ष्या का, द्वेष का, तुलना का और दूसरे को नीचे गिराने का अंधेरा एकत्र हो गया है, उसे कौन-सा दीप दूर करेगा? यही प्रश्न आज के समाज का सबसे विचारणीय प्रश्न है। आज मैं देखती हूँ, एक विचित्र प्रवृत्ति ने हमारे भीतर घर कर लिया है। भागमभाग भरी इस जीवन-शैली में, प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़ में, हम इतने अधीर हो गए हैं कि किसी को अपने से आगे बढ़ते हुए देखना ही नहीं चाहते। यह प्रवृत्ति युवा वर्ग में प्रतिस्पर्धा के नाम पर, तो बड़े वर्ग में अहं के नाम पर दिखाई देती है। अपने कार्यस्थल पर हम अपने ही सहकर्मी की उन्नति से व्यथित हो उठते हैं, अपने सहयोगियों और मित्रों की सफलता में अपना ...

अन्नू राठौड़ (रुद्रांजली) की कलम से ''अंतर्मन का दीप''

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अन्नू राठौड़ (रुद्रांजली) की कलम से '' अंतर्मन का दीप'' दीपावली आती है तो घर जगमगा उठते हैं। द्वार पर बंदनवार, आँगन में रंगोली, छत पर लड़ियों की ज्योति और भीतर लक्ष्मी पूजन की तैयारी। हम इस बाह्य प्रकाश-पर्व में इतनी लीन हो जाते हैं कि विस्मृत कर बैठते हैं कि एक और घर भी है, जिसे वर्ष भर से प्रकाश की प्रतीक्षा है — वह है हमारा अंतर्मन। बाहर का तम तो एक दीप से छिन्न-भिन्न हो जाता है, पर भीतर का तम? भीतर जो ईर्ष्या का, द्वेष का, तुलना का और दूसरे को नीचे गिराने का अंधेरा एकत्र हो गया है, उसे कौन-सा दीप दूर करेगा? यही प्रश्न आज के समाज का सबसे विचारणीय प्रश्न है। आज मैं देखती हूँ, एक विचित्र प्रवृत्ति ने हमारे भीतर घर कर लिया है। भागमभाग भरी इस जीवन-शैली में, प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़ में, हम इतने अधीर हो गए हैं कि किसी को अपने से आगे बढ़ते हुए देखना ही नहीं चाहते। यह प्रवृत्ति युवा वर्ग में प्रतिस्पर्धा के नाम पर, तो बड़े वर्ग में अहं के नाम पर दिखाई देती है। अपने कार्यस्थल पर हम अपने ही सहकर्मी की उन्नति से व्यथित हो उठते हैं, अपने सहयोगियों और मित्रों की सफलता में अपना ...

अन्नू राठौड़ (रुद्रांजली) की कलम से ''अंतर्मन का दीप''

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अन्नू राठौड़ (रुद्रांजली) की कलम से '' अंतर्मन का दीप'' दीपावली आती है तो घर जगमगा उठते हैं। द्वार पर बंदनवार, आँगन में रंगोली, छत पर लड़ियों की ज्योति और भीतर लक्ष्मी पूजन की तैयारी। हम इस बाह्य प्रकाश-पर्व में इतनी लीन हो जाते हैं कि विस्मृत कर बैठते हैं कि एक और घर भी है, जिसे वर्ष भर से प्रकाश की प्रतीक्षा है — वह है हमारा अंतर्मन। बाहर का तम तो एक दीप से छिन्न-भिन्न हो जाता है, पर भीतर का तम? भीतर जो ईर्ष्या का, द्वेष का, तुलना का और दूसरे को नीचे गिराने का अंधेरा एकत्र हो गया है, उसे कौन-सा दीप दूर करेगा? यही प्रश्न आज के समाज का सबसे विचारणीय प्रश्न है। आज मैं देखती हूँ, एक विचित्र प्रवृत्ति ने हमारे भीतर घर कर लिया है। भागमभाग भरी इस जीवन-शैली में, प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़ में, हम इतने अधीर हो गए हैं कि किसी को अपने से आगे बढ़ते हुए देखना ही नहीं चाहते। यह प्रवृत्ति युवा वर्ग में प्रतिस्पर्धा के नाम पर, तो बड़े वर्ग में अहं के नाम पर दिखाई देती है। अपने कार्यस्थल पर हम अपने ही सहकर्मी की उन्नति से व्यथित हो उठते हैं, अपने सहयोगियों और मित्रों की सफलता में अपना ...